1973, लम्ब्रेटा, 1.27 लीटर पेट्रोल... महंगे तेल पर पेट्रोलियम मंत्री कॉलेज के दिनों से खोज लाए तर्क

नई दिल्लीपेट्रोलियम मंत्री ने हमारे सहयोगी टेलिवीजन चैनल टाइम्स नाउ के मंच पर अपनी स्टूडेंट लाइफ की याद आ गई। उनसे पूछा गया था कि पेट्रोल-डीजल के भाव इतना ज्यादा क्यों है और अगर ऐसा फ्री मार्केट की वजह से है तो फिर चुनावों के वक्त इनके भाव घट कैसे जाते हैं? पुरी को याद आई यूनिवर्सिटी और लम्ब्रेटा स्कूटर पुरी को ऐसे सवाल पूछे जाने का अंदेशा था, इस कारण वो बाकायदा होम वर्क करके एक शीट साथ में लाए थे। उन्होंने कहा कि जब वो 1973 में यूनिवर्सिटी में पढ़ रहे थे तो वह लम्ब्रेटा स्कूटर से जाते थे। उस वक्त पेट्रोल का भाव 1.25 रुपये प्रति लीटर था। मंत्री ने कहा, 'मैंने उसके बाद से सात-सात वर्ष के अंतराल पर पेट्रोल की कीमतों में वृद्धि का आकलन किया। सात वर्ष का अंतराल इसलिए रखा क्योंकि केंद्र में नरेंद्र मोदी सरकार के सात साल ही हुए हैं। मैंने पाया कि मोदी सरकार के सात साल में पेट्रोल का भाव पिछले किसी भी सात वर्ष के अंतराल में हुई वृद्धि के मुकाबले कम बढ़े हैं।' पुरी ने कहा कि मोदी सरकार के सात वर्षों में पेट्रोल के दाम 30% बढ़े हैं जबकि अतीत में 70% की वृद्धि हो चुकी है। पुरी ने बताया- कहां खर्च हो रहा पेट्रोल का पैसा केंद्रीय मंत्री ने कहा कि पेट्रोल-डीजल पर एक्साइज ड्यूटी से सरकारी खजाने में पैसे आ रहे हैं तो उसी से कई कल्याणकारी योजनाएं चल रही हैं। उन्होंने कहा, 'हमने कोविड-19 महामारी के दौरान हमने करोड़ों लोगों को मुफ्त अनाज दिए और सभी को मुफ्त टीका लगवा रहे हैं। इसके साथ ही, गरीब कल्याण की कई योजनाएं चल रही हैं। मोदी सरकार ने अपने पूरे कार्यकाल में पेट्रोल-डीजल पर एक्साइज ड्यूटी की दर 32 रुपये प्रति लीटर फिक्स रखी, चाहे कच्चे तेल का भाव कुछ भी था।' यूपीए सरकार पर फोड़ा ठीकरा पुरी ने कहा कि 2010 में तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने पेट्रोल के भाव पर सरकारी नियंत्रण खत्म कर दिया और फिर 2014 में डीजल को भी बाजार के हवाले कर दिया गया। मार्च 2020 में कच्चा तेल का भाव 19.56 डॉलर था जो आज करीब 84 डॉलर तक पहुंच गया है। उन्होंने पेट्रोल-डीजल की महंगाई के लिए पूर्व की यूपीए सरकार पर भी ठीकरा फोड़ा। कांग्रेस सरकार ने कर्ज लिया, हम भर रहे: पुरी मंत्री ने कहा कि 2004 में कांग्रेस के नेतृत्व में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (UPA) की सरकार देश में बनी थी। 2005 में यूपीए सरकार ने पेट्रोल-डीजल सस्ता रखने के चक्कर में बाजार से कर्ज ले लिया। उन्होंने खुद मौज करने के लिए नाती-पोतों पर कर्ज का बोझ डालने का फैसला किया। पुरी ने कहा, 'यूपीए सरकार ने ऑइल बॉन्ड से 1.40 लाख करोड़ रुपये जुटाए। इस पैसे से उन्होंने पेट्रोल-डीजल पर सब्सिडी दी। चूंकि ऑइल बॉन्ड 15 साल बाद मैच्योर होना था, वो पिछले साल से मैच्योर होने लगे हैं। अब हमारी सरकार को यूपीए सरकार का कर्ज ब्याज सहित चुकाना पड़ रहा है।' यूपीए ने यहां भी दिया झटका पुरी ने आगे कहा कि यूपीए सरकार ने भविष्य में तेल की खपत बढ़ने के लिहाज से तेल की खोज और उसके उत्पादन के साधनों पर भी खर्च नहीं बढ़ाया। अब हमें उस पर भी खर्च भी उठाना पड़ रहा है क्योंकि अगर हमारी अर्थव्यवस्था 2.8 लाख करोड़ डॉलर से 5 लाख करोड़ डॉलर की तरफ बढ़ेगी तो तेल की खपत भी तेजी से बढ़ेगी। उसकी आपूर्ति के लिए तेल की खोज और उसके उत्पादन पर खर्च बढ़ाए बिना संभव नहीं है। कुल मिलाकर पेट्रोलियम मंत्री ने यब बताने की कोशिश की कि कैसे मोदी सरकार अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल सस्ता होने के बाद भी उसका फायदा अपने लोगों को नहीं दे सकी।


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