कोलकाता पश्चिम बंगाल में गठबंधन के बावजूद कांग्रेस पार्टी ने आईएसएफ के साथ कोई खास नजदीकी ना रखने का फैसला किया है। पार्टी की ओर से इस बार चुनाव में आईएसएफ से गठबंधन के बावजूद भी किसी भी तरह का चुनाव प्रचार ना कराने का फैसला किया गया है। कांग्रेस का मानना है कि पार्टी को यह साफ संदेश देना चाहिए कि आईएसएफ लेफ्ट दलों की सहयोगी पार्टी के रूप में गठबंधन में शामिल है, ना कि कांग्रेस के किसी समर्थक के रूप में। पार्टी की इस कोशिश को पश्चिम बंगाल में हिंदू वोटरों को रिझाने की कोशिश के रूप में भी देखा जा रहा है। राजनीति के जानकारों का कहना है कि अगर ऐसा होता है तो इससे पार्टी को अन्य राज्यों में भी चुनावी लाभ मिलेगा। दरअसल, कांग्रेस पार्टी के नेता यह चाहते हैं कि पार्टी की छवि किसी भी तरह सांप्रदायिक रंग ना लेने पाए। ऐसे में पार्टी के प्रदेश और शीर्ष स्तर के नेताओं ने यह फैसला किया है कि पश्चिम बंगाल में आईएसएफ भले गठबंधन का हिस्सा हो, लेकिन इसे लेफ्ट दलों के सहयोगी के रूप में ही दिखाया जाए। इसके लिए कांग्रेस ने जो प्लान बनाया है, वह यह है कि पार्टी अपने कोटे की 90 सीटों पर आईएसएफ से किसी भी तरह का चुनाव प्रचार नहीं कराएगी। इसके अलावा इन सीटों पर आईएसएफ के प्रतिनिधियों से कोई भी समर्थन नहीं मांगा जाएगा। बता दें कि आईएसएफ पश्चिम बंगाल की प्रभावशाली फुरफुरा शरीफ के पीरजादा अब्बास सिद्दीकी की पार्टी है, जिसका कई सीटों पर मुस्लिम वोटरों के बीच सीधा दखल माना जाता है। असम में मंदिरों के दर्शन में जुटीं कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी भी यह साफ संदेश देने की कोशिश में हैं कि पश्चिम बंगाल समेत अन्य राज्यों में भी कांग्रेस हिंदू वोटरों को लेकर कोई समझौता नहीं करना चाहती। चुनाव से ऐन पहले यूपी के प्रयागराज में गंगा स्नान और विंध्याचल मंदिर में दर्शन करने के प्रियंका के फैसले ने यह तो बता दिया है कि पार्टी चुनावी राज्यों में हिंदू वोटरों को अपने पक्ष में करने की एक बड़ी रणनीति पर काम कर रही है। शायद इसी के क्रम में प्रियंका ने असम के चुनावी अभियान का आगाज गुवाहाटी की प्रसिद्ध शक्तिपीठ कामाख्या मंदिर में दर्शन से किया था। पश्चिम बंगाल में कांग्रेस के साथ सीट बंटवारे पर फैसला बता दें कि काफी खींचतान और उठापटक के बाद पश्चिम बंगाल में तीसरे मोर्चे के तौर पर महागठबंधन में सीट समझौते को लेकर आखिर तस्वीर साफ हो गई। बंगाल की 294 सीटों वाली असेंबली के लिए अब गठबंधन का बड़ा घटक सीपीएम 130 सीटों पर, कांग्रेस 92 सीटों पर, फुरफुरा शरीफ के पीरजादा अब्बास सिद्दीकी की पार्टी आईएसएफ 37 सीटों पर, फॉरवर्ड ब्लॉक 15, आरएसपी 11 और सीपीआई 9 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारेंगी। हालांकि आईएसएफ ज्यादा सीटें मांग रही थी। पिछले बार कांग्रेस को मिली थी 44 सीट पिछली बार कांग्रेस 92 सीटों पर लड़ी थी और उसे 44 सीटें मिली थीं। लेफ्ट 101 सीटों पर लड़ा था और उसे 26 सीटें मिली थीं। सूत्रों के मुताबिक, जल्द ही महागठबंधन में विभिन्न घटकों के बीच सीटें भी तय हो जाएंगी। हलांकि कुछ सीटें ऐसी हैं, जिन्हें लेकर कांग्रेस व आईएसएफ के बीच पेच फंसा माना जा रहा था, इनमें मुर्शिदाबाद, उत्तरी दिनाजपुर और मालदा की सीटें हैं। दरअसल, यहां मुस्मिल आबादी खासी है, इसलिए दोनों ही अपने लिए इन इलाकों में सीटें चाह रहे थे। 31 फीसदी मुस्लिम आबादी देखकर कांग्रेस से समझौता माना जा रहा है कि लेफ्ट और कांग्रेस ने सूबे की 31 फीसदी मुस्लिम आबादी को ध्यान में रखते हुए अब्बास सिद्दीकी से हाथ मिलाया। सूत्रों के मुताबिक, अगले चार-पांच दिन में राज्य के दो चरणों के चुनाव को देखते हुए महागठबंधन लगभग 60 सीटों पर अपनी उम्मीदवारी के बारे में ऐलान कर सकता है। चर्चा है कि जल्द ही महागठबंधन कॉमन मिनिमम प्रोग्राम के रूप में अपनी आगामी रणनीति मेनिफेस्टों के रूप में फाइनल कर सकता है। हालांकि पार्टी का यह साफ स्टैंड है कि गठबंधन के बावजूद पार्टी यह नहीं दिखाएगी कि ISF उसकी सहयोगी है और यह संदेश देने का प्रयास होगा कि उससे हाथ मिलाना लेफ्ट दलों का फैसला है।
from India News: इंडिया न्यूज़, India News in Hindi, भारत समाचार, Bharat Samachar, Bharat News in Hindi, coronavirus vaccine latest news update https://ift.tt/3sRfBUt