खेती कानून किसानों के लिए कैंसर, खत्म करके दम लेंगे: राकेश टिकैत

लंबे समय तक किसान आंदोलनों की मुखर आवाज रहे चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत उर्फ बाबा टिकैत के बेटे इन दिनों सुर्खियों में बने हुए हैं। 26 जनवरी के बाद अचानक फेल हुए में राकेश टिकैत ने जान फूंकी और किसानों को वापस दिल्ली आने को मजबूर किया। आंदोलन को ताकत देने के लिए इन दिनों राकेश टिकैत हरियाणा के दौरे पर है। हरियाणा में दौरों के पीछे उनका क्या मकसद है? टिकैत को आंदोलनकारी किसान असली किसान नेता बता रहे है तो कुछ लोग उन पर विपक्षी पार्टियों के इशारें आंदोलन करने के आरोप लगा रहे हैं। आंदोलन की आगे क्या रूपरेखा होगी इन सभी मुद्दों पर एनबीटी के संवाददाता सुरेंद्र कुमार ने राकेश टिकैत से बातचीत की: कई लोगों ने किसान अंदोलन के पीछे विपक्षी पार्टियों के होने के आरोप भी लगाए। इस बारे में आपका क्या कहना है? सबसे पहले तो मैं आपको बता दूं कि ये आंदोलन कोई राजनीतिक आंदोलन नहीं है। यह आंदोलन तो सिर्फ गरीब की रोटी अमीरों की तिजोरियों में बंद ना हो इसलिए है। रही विपक्षी पार्टियों के नेताओं की भूमिका की बात तो मुझे बताओ विपक्ष का क्या काम होता है। जहां अत्याचार हो वहां विपक्ष ही जाता है, सरकार थोड़े ही जाती है। हम ना ही किसी भी पार्टी नेता को मंच देते हैं और ना माइक। सभी पार्टियों के लिए हमारा तो एक ही संदेश है कि वे किसान आंदोलन में वोट तलाश करने ना आएं। सरकार ने कहा कि कृषि बिलों में क्या काला है किसी ने नहीं बताया। बातचीत में सरकार को नहीं बताया कि कानून क्यों हानिकारक हैं? कृषि कानूनों के बारे में आपको एक शब्द में बोल दूं तो ये किसान के लिए कैंसर है। किसानों और सरकार के बीच हुई 11 दौर की बातचीत में सरकार और मीटिंग में आए अधिकारी किसानों की एक भी बात का जवाब नहीं दे पाए। सभी बातों के बाद जब हम सरकार से सिर्फ एक ही बात पूछते कि रद्द करोगे तो सरकार मना कर देती और हम वापस आ जाते। सरकार कानूनों पर डेढ़ साल तक रोक लगाने को भी कह रही है। आखिर आप क्या चाहते हैं और क्या हल होगा? एक बात बताओ कि अगर किसी को कैंसर हो जाए तो क्या उसे रोका जा सकता है। उसका इलाज करके उसे खत्म किया जाता है। ये कानून भी किसान के लिए कैंसर हैं। हम इसका इलाज करके इसे जड़ से खत्म करके ही दम लेंगे। हम चाहते हैं कि फसलों की कीमत किसान तय करें। एमएसपी पर कानून बनें और तीनों कानूनों की वापसी हो। हाल ही में आप जींद गए और अब चरखी दादरी। हरियाणा में दौरों का क्या मकसद है? मेरा हरियाणा में घूमने का एक ही मकसद है और वह है आंदोलन को मजबूत करना। युवाओं में क्रांति और शांति की भावना पैदा करना। आप देखोगे कि हमने आंदोलन की परिभाषा बदली है। अब ना ही किसी को परेशान किया जाता और ना ही किसी की दुकान लूटी जाती। किसान अगर रास्ता रोकता है तो हाथ जोड़कर। रुकने वालों को पानी-चाय-रोटी दी जाती है। हाथ जोड़कर किसानों का समर्थन करने को कहा जाता है। आंदोलन को लेकर लोगों की नकारात्मक सोच को सकारात्मक किया। अगर सरकार मांगें नहीं मानती तो आंदोलन कब तक चलेगा? जब सरकार 70 दिनों में नहीं मानी तो किसानों को समझ आ चुका है कि आंदोलन लंबा चलेगा। बीच में प्लानिंग करके आंदोलन का स्वरूप भी बदलेंगे। सरकार को एक बात समझ लेनी चाहिए कि किसान अपनी मांग मनवाए बगैर उठेगा नहीं।


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