10 साल जेल में काटे, अब नाबालिग के रूप में रिहा होगा 52 साल का व्यक्ति

नई दिल्लीः 36 साल पहले जिस व्यक्ति पर चार्जशीट दाखिल हुई थी और जो आजीवन कारावास की सजा के अंतर्गत 10 साल जेल में बिता चुका है, जूवेनाइल ऐक्ट के तहत 52 साल के उस व्यक्ति के लिए अब जेल से बाहर निकलने का रास्ता खुल गया है। सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने इस संबंध में उसकी याचिका स्वीकार कर ली। बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने उसकी याचिका को खारिज करते हुए 2011 में हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा था और आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश में बागपत जिले के जूवेनाइल जस्टिस बोर्ड को यह निर्देश दिया था कि वह याचिकाकर्ता के दावे की जांच करें कि वह अपराध के समय नाबालिग था और अपनी रिपोर्ट दे। बोर्ड ने इस मामले में सभी जरूरी डॉक्युमेंट्स की जांच करने, परिवार के सदस्यों और स्कूल टीचरों से बात करने के बाद याचिकाकर्ता के दावे का समर्थन किया है और कहा है कि अपराध के समय वह नाबालिग था। 1986 में हुई थी वारदात हत्या की यह वारदात 19 अगस्त 1986 को हुई थी और 1990 में ट्रायल कोर्ट ने संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया था। लेकिन इलाहाबाद कोर्ट ने 2007 में फैसले को पलटते हुए उसे दोषी माना था। इसके बाद याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट में हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती थी लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा और 2011 में उसे आजीवन कारावास की सजा सुनाई। हैरानी का बात यह है कि इस मामले में उस वक्त नाबालिग होने का मुद्दा नहीं उठाया गया। संभव है कि ऐसा कानून की समझ न होने या वकील की ओर से सही सलाह न मिलने के कारण हुआ हो। जूवेनाइल ऐक्ट में दायर की याचिका करीब एक दशक जेल में रहने के बाद याचिकाकर्ता ने अपने वकील ऋषि मल्होत्रा के ज़रिए कोर्ट में जूवेनाइल ऐक्ट के अंतर्गत याचिका दायर की। वकील ने कहा कि केस में अंतिम फैसला आने के बाद भी नाबालिग होने का दावा किया जा सकता है। मल्होत्रा ने कहा, इस मामले को इस कोर्ट में पहली बार या केस का अंतमि फैसला आने के बाद भी उठाया जा सकता है और इसे इस आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता है कि यह दावा पहने नहीं किया गया या दावा करने में देर हो गई है। अगर नाबालिग होने के दावे को ट्रायल कोर्ट में नहीं उठाया गया था, तब भी इसे सुप्रीम कोर्ट में उठाया जा सकता है और अपील की जा सकती है।' उन्होंने कहा, स्कूल द्वारा जारी सेंकडरी सर्टिफिकेट, उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा जारी जन्म प्रमाणपत्र के साथ-साथ बागपत RTO द्वारा जारी ड्राइविंग लाइसेंस सभी में याचिकाकर्ता की जन्मतिथि 10 अगस्त 1970 है और इस आधार पर अपराध के समय याचिकाकर्ता की उम्र 16 साल थी। याचिकाकर्ता के दावे और जूवेनाइल जस्टिस बोर्ड की जांच रिपोर्ट को स्वीकार करते हुए जस्टिस संजय किशन कौल और एमएम सुंद्रेश की बेंच ने उसे जेल से रिहा करने का निर्देश दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल उत्तर प्रदेश सरकार से कहा था कि वह आगरा जेल के 23 कैदियों के नाबालिग होने के दावे की जांच करे, इसमें बहुत से याचिका ऐसी हैं जिनमें याचिकाकर्ता 20 से ज्यादा का समय जेल में बिता चुके हैं।


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