प्रियंका का अकेले चुनाव लड़ने का एलान, 32 साल के इतिहास से समझिए कांग्रेस की मर्जी है या मजबूरी?

लखनऊउत्तर प्रदेश की सियासत में रसातल पर जा चुकी कांग्रेस इस बार के विधानसभा चुनाव में दोबारा उठ खड़ा होने की जीतोड़ कोशिश कर रही है। कांग्रेस महासचिव और यूपी प्रभारी प्रियंका गांधी की अगुवाई में कांग्रेस यूपी में अपनी खोई हुई जमीन ढूंढ़ने की कोशिश कर रही है। इसी कोशिश के बीच प्रियंका गांधी ने एलान कर दिया है कि पार्टी इस बार के विधानसभा चुनाव में अकेले ही मैदान में उतरेगी। इस निर्णय के पीछे प्रियंका ने कार्यकर्ताओं और नेताओं से मिले फीडबैक को आधार बताया है। बुलंदशहर में कांग्रेस प्रतिज्ञा सम्मेलन- लक्ष्य 2022 कार्यक्रम में प्रियंका ने कहा कि मुझे कई लोगों ने कहा कि कुछ भी कीजिए इस बार गठबंधन मत करिए। मैं आप लोगों को आश्वासन देना चाहती हूं हम सारी सीटों पर लड़ेंगे, अपने दम पर लड़ेंगे। प्रियंका के इस एलान के बाद लखनऊ के सत्ता के गलियारे में तरह-तरह की चर्चाएं शुरू हो गई हैं। सवाल उठ रहे हैं कि क्या गठबंधन से दूरी की वजह ये है कि पिछले 3 दशक से पार्टी चुनाव दर चुनाव निचले स्तर पर गिरती जा रही है। गठबंधन उसे सूट नहीं किया। दूसरा ये कि यूपी चुनाव में फिलहाल कांग्रेस के साथ कोई गठबंधन का इच्छुक ही नहीं है, लिहाजा अकेले लड़ने का फैसला मजबूरी है? दरअसल कांग्रेस पार्टी पिछले 30 सालों से उत्तर प्रदेश में 50 सीटों का आंकड़ा तक नहीं पा सकी है। आखिरी बार 32 साल पहले उसने 1989 में 94 सीटें जीती थीं, उसके बाद 1991 में वह 46 पर गिरी, फिर 1996 में 33, 2002 में 25, 2007 में 22, 2012 में 28 और 2017 में 7 सीटें उसके हिस्से में रह गईं। गठबंधन को लेकर इस दौरान पार्टी ने खूब प्रयाेग किए लेकिन गठबंधन से उलटे वह और नीचे खिसकती चली गई। आखिरी बार 2017 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने सपा के साथ गठबंधन किया और यहां वह महज 7 सीटें ही जीत सकी। अब 2022 चुनाव से पहले कांग्रेस छत्तीसगढ़ मॉडल पर काम कर रही है और लुभावने वादों के साथ प्रदर्शन, जनसंपर्क पर काम कर रही है। ताजा रणनीति में उसने महिलाओं को 40 फीसदी टिकट देने के साथ ही कई लुभावने वादे किए हैं। कांग्रेस के प्रवक्ता अंशु अवस्थी कहते हैं कि प्रियंका गांधी और कांग्रेस पार्टी ने अकेले चुनाव लड़ने का जो निर्णय लिया है, ये मजबूरी नहीं मजबूती के साथ लिया गया है। ये उत्तर प्रदेश के लोगों की आवाज है। कांग्रेस पार्टी का संगठन इससे पहले जरूर कमजोर था लेकिन प्रियंका गांधी लगातार दो साल से उसी संगठन को मजबूत करने का काम कर रही हैं और उसका परिणाम भी आपने गोरखपुर और बनारस में देखा। लोगों की भी राय थी कि उत्तर प्रदेश में हम मजबूती से लड़ें। यूपी में हमारी जो प्रतिज्ञाएं हैं उसे लेकर लोगों में कांग्रेस के प्रति विश्वास बढ़ा है। अंशु अवस्थी कहते हैं कि बहुत दिनों बाद हमारा संगठन जमीनी स्तर पर तैयार हुआ है। पहले संगठन हुआ करता था लेकिन लोगों का अपना पॉकेट संगठन होता था। इस बार कांग्रेस का संगठन बन रहा है, वह किसी व्यक्ति विशेष का संगठन नहीं है। 2022 में इस बदलाव का असर देखने को मिलेगा। वैसे उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के प्रदर्शन के इतिहास की बात करें तो सीटों के सूखे की शुरुआत 89 के चुनाव में हो गई थी। इस चुनाव में आखिरी बार कांग्रेस 100 के करीब पहुंची थी, जनता दल को 208 सीटें मिली थीं, जबकि कांग्रेस को 94 सीटें, बीएसपी 13 सीटों के साथ उपस्थिति दर्ज करा चुकी थी। इसके बाद 1991 में हाल और बुरा हुआ। बीजेपी जहां 221 तक पहुंच गई, वहीं कांग्रेस 46 पर सिमट गई। जनता दल 92 और बसपा 12 रही। फिर 1996 में कांग्रेस ने बीएसपी के साथ गठबंधन किया। यहां कांग्रेस को भारी नुकसान का सामना करना पड़ा, उसे महज 33 सीटों पर संतोष करना पड़ा, वहीं बीएसपी 67 सीटों पर काबिज हो गई। इसके बाद 2002 में 25, 2007 में 22, 2012 में 28 सीटें कांग्रेस जीत सकी। पार्टी को जिंदा करने की कोशिश में हाईकमान ने 2017 के चुनाव में समाजवादी पार्टी से गठबंधन किया और नतीजतन कांग्रेस महज 7 सीटें ही जीत सकी है। अब स्थिति ये है कि गठबंधन के लिए कोई पार्टी इनकी तरफ नहीं देख रही। पिछले दिनों आरएलडी के जयंत चौधरी से प्रियंका गांधी की एयरपोर्ट पर मुलाकात चर्चा में जरूर रही लेकिन उसका लाभ कुछ नहीं निकला। आरएलडी की सपा के साथ गठबंधन करने की बात सामने आई है। वहीं सुभासपा के ओम प्रकाश राजभर भी कुछ समय पहले चर्चा में थे लेकिन वो भी बात जमीन पर नहीं उतरी। वैसे इसमें दिलचस्प बात ये है कि कांग्रेस ने 2009 में लोकसभा चुनाव अकेले दम पर लड़ा और 22 सीटें अपने नाम की थी।


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