भारत के साथ लद्दाख में सीमा पर तनाव बढ़ाना चीन को अब महंगा पड़ता दिखाई दे रहा है। अपनी दादागिरी और विस्तारवादी नीतियों के लिए कुख्यात चीन अब हिंद-प्रशांत क्षेत्र में घिरता जा रहा है। चीन के खिलाफ न केवल उसके पड़ोसी देश बल्कि हजारों किलोमीटर दूर स्थित देश भी खड़े हो गए हैं। भारत, जापान ऑस्ट्रेलिया, ताइवान और अमेरिका खुलकर चीन के खिलाफ हैं। शायद यही कारण है कि ड्रैगन को अब अपने कदम पीछे खींचना पड़ रहा है।भारत के साथ लद्दाख में एलएसी पर 15 जुलाई के बाद से ही तनाव चरम पर है। गलवान घाटी में चीनी सैनिकों के साथ हुई झड़प और ड्रैगन के विश्वासघाती रवैये को देखते हुए भारत कोई रिस्क नहीं लेना चाहता। इस कारण न केवल सीमा पर जवानों की तैनाती बढ़ा दी गई है। बल्कि, हिंद महासागर में भारतीय नौसेना ने पेट्रोलिंग तेज की है। चीन के जल, थल और नभ में किए गए किसी भी हिमाकत का जवाब देने के लिए भारतीय सशस्त्र बल पूरी तरह तैयार हैं।
चीन गलवान और गोगरा हॉट स्प्रिंग इलाके से फौज हटाने के लिए तो तैयार हो गया है, लेकिन पैंगोंग त्सो झील इलाके में उसके इरादे अब भी नेक नहीं लग रहे हैं। पैंगोंग झील इलाके को लेकर जो टकराव है उस पर अभी स्थिति साफ होती नहीं दिख रही है। यहां पर पीएलए (चीनी) सैनिकों ने बड़ी संख्या में बंकर बना लिए हैं और इस इलाके की किलेबंदी सी कर दी है। उसके सैनिकों ने फिंगर- 4 से 8 तक अपना कब्जा जमाने के बाद यहां सबसे ऊंची चोटी पर भी अपना कब्जा जमाया हुआ है। माना जा रहा है कि यह तनाव अभी कई महीनों तक चल सकता है।
जापान के साथ भी चीन पूर्वी चीन सागर में द्वीपों के स्वामित्व को लेकर उलझा हुआ है। दोनों देश इन निर्जन द्वीपों पर अपना दावा करते हैं। जिन्हें जापान में सेनकाकु और चीन में डियाओस के नाम से जाना जाता है। इन द्वीपों का प्रशासन 1972 से जापान के हाथों में है। हाल में ही जापान ने चीनी सेना की एक पनडुब्बी और एक स्ट्रैटजिक बॉम्बर एयरक्राफ्ट को अपनी सीमा से बाहर भगााया था।
चीन से खतरे को देखते हुए जापान ने न केवल पूर्वी चीन सागर और प्रशांत महासागर बल्कि हिंद महासागर में भी अपनी ऑपरेशनल गतिविधियों को बढ़ाया है। जापानी की नौसेना भारत के साथ मिलकर युद्धाभ्यास कर रही हैं। इसका मकसद न केवल आपसी तालमेल को बढ़ाना है बल्कि हिंद महासागर से चीन को अलग-थलग करना भी है। वहीं, इसमें भारत और जापान का अमेरिका खुलकर साथ दे रहा है।
चीन और ऑस्ट्रेलिया के बीच जारी विवाद अब और गहराता दिखाई दे रहा है। चीनी सरकार की ओर से लगातार किए जा रहे आर्थिक घेराबंदी और साइबर हमलों से परेशान ऑस्ट्रेलिया ने इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में अपनी सेना को और मजबूत करने का फैसला किया है। ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरिशन ने सेना के लिए नए हथियारों के खरीद की भी घोषणा की है। इसके अलावा एशिया प्रशांत क्षेत्र में ऑस्ट्रेलिया कई महत्वपूर्ण क्षेत्र में अपनी सेना की तैनाती बढ़ाएगा।
पीएम मॉरिशन ने बुधवार को घोषणा करते हुए कहा कि ऑस्ट्रेलिया अपने सुपर हॉर्नेट फाइटर जेट्स के बेड़े को मजबूत करने के लिए लंबी दूरी के एंटी शिप मिसाइलों की खरीद सहित देश की रक्षा रणनीति में बदलाव किया जाएगा। ऑस्ट्रेलिया ने ऐसा कदम मित्र देशों, सहयोगियों और मुख्य भूमि की रक्षा के लिए उठाया है। ऑस्ट्रेलिया इस जमीन से लॉन्च की जा सकने वाली लॉन्ग रेंज सरफेस टू सरफेस मिसाइल और सरफेस टू एयर मिसाइल के खरीद के बारे में भी विचार कर रहा है। इसके अलावा हाइपरसोनिक मिसाइलों के खरीद को लेकर भी अमेरिका से बात करने की तैयारी है।
चीन के खिलाफ अमेरिका एशिया में अपनी फौज को बढ़ाने की तैयारी कर रहा है। चीन के आक्रामक रवैये की आलोचना करते हुए यूएस कहा कि हम भारत और अपने मित्र देशों को चीन से खतरे के मद्देनजर अपने सैनिकों की तैनाती की समीक्षा कर रहे हैं। चीन को सीधे तौर पर चेतावनी देते हुए अमेरिका ने कहा कि जरूरत पड़ी तो अमेरिकी सेना चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी से मुकाबला करने को तैयार है।
अमेरिका के पास दुनिया की सबसे आधुनिक सेना और हथियार हैं। दुनियाभर के देशों की सैन्य ताकत का आंकलन करने वाली ग्लोबल फायर पॉवर इंडेक्स के अनुसार 137 देशों की सूची में आर्मी, नेवी और एयरफोर्स के मामले में अमेरिका दुनिया के बाकी देशों से बहुत आगे है। अमेरिकी रक्षा मंत्रालय के अनुसार, अमेरिका के दुनिया में 800 सैन्य ठिकाने हैं। इनमें 100 से ज्यादा खाड़ी देशों में हैं। जहां 60 से 70 हजार जवान तैनात हैं।
एशिया में चीन की विस्तारवादी नीतियों से भारत को सबसे ज्यादा खतरा है। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण लद्दाख में चीनी फौज के जमावड़े से मिल रहा है। इसके अलावा चीन और जापान में भी पूर्वी चीन सागर में स्थित द्वीपों को लेकर तनाव चरम पर है। हाल में ही जापान ने एक चीनी पनडुब्बी को अपने जलक्षेत्र से खदेड़ा था। चीन कई बार ताइवान पर भी खुलेआम सेना के प्रयोग की धमकी दे चुका है। इन दिनों चीनी फाइटर जेट्स ने भी कई बार ताइवान के हवाई क्षेत्र का उल्लंघन किया है। वहीं चीन का फिलीपींस, मलेशिया, इंडोनेशिया के साथ भी विवाद है।
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