नेपाल की सियासी तूफान पर भारत की नजर

नई दिल्ली नेपाल के प्रधानमंत्री के पी ओली ने भारत के कुछ इलाकों को अपने देश के नए नक्शे में शामिल करके दोनों देशों को रिश्तों में कड़वाहट घोल दी थी। लेकिन अब उन्हें अपनी ही कम्युनिस्ट पार्टी में बगावत का सामना करना पड़ रहा है। भारत नेपाल के राजनीतिक घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए है। पिछले कुछ दिनों में नेपाल की सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी में मतभेद खुलकर सामने आने लगे हैं। हालांकि अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि पी के शर्मा ओली को दिन अब गिने चुने रह गए हैं लेकिन पार्टी में उनके धुर विरोधी पी के दहल प्रचंड ने साफ कहा है कि वह ओली की मनमाने ढंग से काम करने के तरीके से तंग आ चुके हैं। नेपाल से आ रही खबरों के मुताबिक ओली के इस्तीफे की मांग की जा रही है। इस बीच यह खबर भी आई थी कि नेपाल ने चीन को जमीन दी है लेकिन नेपाल के विदेश मंत्रालय ने इसका खंडन किया है। भारत की सधी प्रतिक्रिया नेपाल के हालिया आंतरिक घटनाक्रम पर भारत ने नपीतुली प्रतिक्रिया व्यक्त की है। भारत ने काठमांडू को केवल इतना याद दिलाया कि लॉकडाउन के बावजूद भारत ने नेपाल को जरूरी चीजों की आपूर्ति प्रभावित नहीं होने दी है। मई में नेपाल के साथ द्विपक्षीय व्यापार 30 करोड़ डॉलर को पार कर गया। भारत का साफ कहना है कि दोनों देशों के बीच रोटी-बेटी का संबंध है। नेपाली मीडिया में आ रही खबरों के मुताबिक कम्युनिस्ट पार्टी की स्टैंडिंग कमेटी की इस हफ्ते हुई बैठक में ओली और प्रचंड ने एकदूसरे को खरी-खरी सुनाई। काठमांडू पोस्ट ने पार्टी सूत्रों के हवाले से कहा कि प्रचंड ने इस मीटिंग में कई सनसनीखेज खुलासे किए। उन्होंने बताया कि सत्ता में बने रहने के लिए ओली क्या-क्या हरकतें कर रहे हैं। अखबार ने एक सूत्र के हवाले से बताया कि प्रचंड ने बैठक में कहा, ‘हमने सुना है कि सत्ता में बने रहने के लिए पाकिस्तानी, अफगानी और बांग्लादेशी मॉडल अपनाए जा रहे हैं लेकिन ऐसे प्रयास सफल नहीं होंगे।’ ओली से खुश नहीं हैं प्रचंड स्टैंडिंग कमेटी में ओली गुट अल्पमत में है। प्रचंड ने बैठक में कहा कि भ्रष्टाचार के झूठे आरोपों में किसी को भी जेल भेजना आसान नहीं है। उन्होंने कहा, ‘सेना की मदद से देश पर राज करना आसान नहीं है। पार्टी को तोड़कर विपक्ष के साथ गठजोड़ करके सरकार नहीं चलाई जा सकती है।‘ हालांकि प्रचंड की सोच भी भारत के मुफीद नहीं रही है लेकिन भारत का मानना है कि उन्होंने कभी भी भारतीय हितों की उस तरह से अनदेखी नहीं की है जैसी ओली कर रहे हैं। गुरुवार को नेपाल ने इन बात का खंडन किया कि चीन के उसकी जमीन पर कब्जा किया है। उसने कहा कि चीन और नेपाल की सीमा 1961 के सीमा समझौते और उसके बाद हुए समझौतों के मुताबिक चिह्नित की गई है। नेपाल में सत्‍ता में वामपंथी, चीन से नजदीकी नेपाल में इन दिनों राजनीति में वामपंथियों का दबदबा है। वर्तमान प्रधानमंत्री केपी शर्मा भी वामपंथी हैं और नेपाल में संविधान को अपनाए जाने के बाद वर्ष 2015 में पहले प्रधानमंत्री बने थे। उन्‍हें नेपाल के वामपंथी दलों का समर्थन हासिल था। केपी शर्मा अपनी भारत विरोधी भावनाओं के लिए जाने जाते हैं। वर्ष 2015 में भारत के नाकेबंदी के बाद भी उन्‍होंने नेपाली संविधान में बदलाव नहीं किया और भारत के खिलाफ जवाबी कार्रवाई के लिए केपी शर्मा चीन की गोद में चले गए। नेपाल सरकार चीन के साथ एक डील कर ली। इसके तहत चीन ने अपने पोर्ट को इस्तेमाल करने की इजाज़त नेपाल को दे दी। भारत का विरोध कर जीता चुनाव पीएम केपी शर्मा ओली ने भी पिछले चुनाव में भारत के खिलाफ जमकर बयानबाजी की थी। उन्‍होंने भारत का डर दिखाकर पहाड़‍ियों और अल्‍पसंख्‍यकों को एकजुट किया और सत्‍ता हास‍िल कर ली। वहीं पुरानी पार्टी नेपाली कांग्रेस नेपथ्‍य में चली गई है और वाम दल पहाड़ी लोगों में भारत के खिलाफ दुष्‍प्रचार करने में लगे हुए हैं।


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