नगर निगम चुनाव : नेताओं के अरमां आंसुओं में यूं लगे बहने

इंदौर। नगर निगम चुनाव को लेकर हलचल तेज हो गई है। मौजूदा स्थिति को देखते हुए महापौर का चुनाव अप्रत्यक्ष प्रणाली से होता नजर आ रहा है यानी पार्षद अपना नेता चुनेंगे। इस फॉर्मूले ने भाजपा के कई नेताओं के महापौर बनने
के अरमानों पर पानी फेर दिया है।

सुप्रीम कोर्ट की गाइड लाइन के बाद में राज्य निर्वाचन आयोग हरकत में आ गया है। उसके साथ भाजपा और कांग्रेस के प्रदेश संगठन ने भी अपनी टीम को सक्रिय कर मोर्चा संभालने के निर्देश जारी कर दिए हैं। नगर निगम और पंचायत क्षेत्र में अचानक राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। इंदौर को राजनीति का गढ़ माना जाता है, जहां से आसपास के दो संभागों में वातावरण बनता है। चुनाव की घोषणा होने के बावजूद सत्ताधारी भाजपा के कुछ नेताओं में जोश आने के बजाय उदासी का आलम है। पर्दे के पीछे की कहानी ये है कि वे अप्रत्यक्ष प्रणाली से होने वाले महापौर के चुनाव से दु:खी हैं, क्योंकिउनके अरमानों पर सीधे-सीधे पानी फिर गया।


इंदौर में महापौर की सीट सामान्य होने के बाद में कई दावेदारों को सपने आने लग गए थे। इन दावेदारों में विधायक भी शामिल थे। इसमें विधायक रमेश मेंदोला व मालिनी गौड़, पूर्व विधायक सुदर्शन गुप्ता के अलावा पूर्व महापौर कृष्णमुरारी मोघे की भी रुचि थी। गौड़ और मोघे दोनों ही इस ताक में बैठे थे कि एक मौका और मिल जाए। गौड़ की टीम का तो यहां तक दावा था कि स्वच्छता में इंदौर पांच बार लाने का श्रेय उनको ही है, जिसकी वजह से पार्टी उन्हें फिर मौका दे सकती है। पार्षद बनकर महापौर बनने के फॉर्मूले से सभी को करारा झटका लगा है। इनमें से एक भी नेता इस तरीके से महापौर बनने का इच्छुक नहीं है। उस हिसाब से दूसरी पंक्ति के नेताओं की इंदौर में लॉटरी खुल सकती है।

नहीं है कोई भी सहमत
अप्रत्यक्ष प्रणाली से महापौर के चुनाव को लेकर सत्ताधारी भाजपा के अधिकतर नेता सहमत नहीं हैं। इस सूची में प्रदेश के प्रभारी मुरलीधर राव, प्रदेश अध्यक्ष वीडी शर्मा और संगठन महामंत्री हितानंद शर्मा का नाम भी है, जो महापौर का चुनाव प्रत्यक्ष के पक्ष में है।

बताया जा रहा है कि अचानक बनी परिस्थिति के बावजूद कुछ नेता चाहते हैं कि मुख्यमंत्री शिवराजङ्क्षसह चौहान जल्द ही कैबिनेट बुलाकर प्रत्यक्ष महापौर चुनाव का प्रस्ताव पास करें और विधानसभा का विशेष सत्र बुलाकर उस पर मुहर भी लगवाएं। इसके पीछे का तर्क ये है कि प्रत्यक्ष महापौर का शहर के विकास को लेकर अपना एक ²ष्टिकोण होता है। चुनकर आने वाला महापौर यों ही पार्षदों से दबा हुआ होता है, जिसकी वजह से वह कठोर फैसले नहीं ले पाता। इसका सीधा असर शहर विकास पर पड़ेगा।



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