कश्मीर फाइल्स: बंदूक की कलम, आवाम सा पन्ना और खून की स्याही, ऐसे लिखा गया जन्नत का इतिहास

हां, मैं नहीं जानता कि आखिर 1990 से पहले वाली कश्मीर की सुब्ह हम कब तक देख पाएंगे। सरकारें किसी की भी हों, गुनहगार कोई भी हो, समय चाहे जितना जीत बीत चुका हो, अगर लोकतांत्रिक देश में ऐसी घटनाएं होती हैं तो फिर उनको छिपाया जाता है तो ये हरगिज बर्दाश्त नहीं होना चाहिए।

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