नई दिल्ली: इंटेलिजेंस के सबसे माहिर 'खिलाड़ी' और 'भारत के जेम्स बॉन्ड' कहे जाने वाले राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल का आज जन्मदिन है। उनका जन्म 20 जनवरी 1945 को उत्तराखंड के एक गढ़वाली परिवार में हुआ था। उन्हें जिस भी ऑपरेशन की जिम्मेदारी दी गई, उन्होंने बखूबी उसे अंजाम दिया। कट्टरपंथियों के खिलाफ ऑपरेशन हो, घाटी में शांति लाना हो, पाकिस्तान को मुंहतोड़ जवाब, चीन के दुस्साहस पर अंकुश, उग्रवाद से निपटना हो, 1999 का कंधार कांड... हर अभियान में डोभाल का डंका बजा। डोभाल सात साल तक पाकिस्तान में अंडरकवर एजेंट की तरह काम करते रहे और किसी को भनक तक नहीं लगी। शायद इसी वजह से उन्हें भारत का 'जेम्स बॉन्ड' कहा जाता है। भारत विदेशी ताकतों से उतना नहीं हारा जितना... वह लाइमलाइट से दूर रहते हैं लेकिन जब कभी मंच से बोलते हैं तो पूरा देश बड़े ध्यान से सुनता है। आज उनके जन्मदिन पर लोग सोशल मीडिया पर उन्हें बधाई और शुभकामनाएं दे रहे हैं। कुछ लोग उनके पुराने संदेशों, तस्वीरों और भाषण के वीडियो भी शेयर कर रहे हैं। इसमें एक उनका चर्चित भाषण रहा है जब उन्होंने कहा था कि भारत कभी विदेशी ताकतों से इतना नहीं हारा जितना यहां के लोगों के साथ न देने के कारण उसकी हार हुई। वह आगे यह भी कहते हैं कि उन्हें आज भी यह शंका रहती है कि कहीं देश के लोग ही राष्ट्र की सुरक्षा का सौदा न कर बैठें। अजीत डोभाल के भाषण का अंश आज सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो में डोभाल के भाषण का एक अंश है। इसमें NSA अजीत डोभाल कहते हैं, 'भारत विदेशों से इतना नहीं हारा... अंग्रेजों ने भारत के खिलाफ कोई भी लड़ाई ऐसी नहीं जीती, जिसमें अंग्रेजों की फौज में भारतीय सिपाही न रहे हों। चाहे वह पहले बंगाल नेटिव आर्मी थी, 1857 में गोरखा और सिखों ने उनका साथ दिया, जब सिखों से लड़ाई हो रही थी तो बाकी लोगों ने उनका साथ दिया। हमेशा नेटिव आर्मी उनके साथ थी।' उन्होंने आगे कहा कि जब-जब आक्रमण वेस्ट से हुआ चाहे वह पर्शियंस थे, हूण, मंगोल, मुगल आए। वे तो थोड़े से लोग आए थे। तब लश्कर कहां बने? लश्कर बने काबुल में, उस समय तक इस्लामीकरण नहीं हुआ था, लाहौर और सरहिंद में.... हिंदुस्तानियों को हराया है तो हमेशा हिंदुस्तान के लोगों ने। साथ नहीं दिया देश ने और दर्द है तो सिर्फ इसी बात का। डोभाल का सबसे बड़ा दर्द डोभाल कहते हैं कि भारत के इतिहास को देखें तो दर्द इस बात का नहीं है कि विदेशों ने हमारे साथ क्या किया। उनका तो हम मुकाबला कर लेते। दुख इस बात का था कि हमारे सभी लोगों ने साथ नहीं निभाया और साथ नहीं दिया। उन्होंने कहा कि इसकी फीलिंग (एहसास) आज भी मुझे इस देश में होती है। उन्होंने आगाह करते हुए कहा कि भारत को आंतरिक और वाह्य शक्तियों से जो सबसे बड़ा खतरा है... वह खतरा इस बात का है कि हमारे अपने लोग ही कहीं राष्ट्र की सुरक्षा, राष्ट्र की अस्मिता, राष्ट्र के गौरव का सौदा न कर बैठें। अपने आज के सुख के लिए अपने भविष्य को अंधकारमय न कर दें। इसके लिए जो जागरूकता चाहिए, इसके लिए जो ताकत पैदा करनी है वो ताकत केवल समाज के अंदर ही पैदा की जा सकती है। उसको केवल आप लोग कर सकते हैं, आज की युवा शक्ति कर सकती है। इतिहास ने हमें सजा दी.... डोभाल की यह बात भी समझिए अजीत डोभाल के भाषण का एक और हिस्सा सोशल मीडिया पर वायरल है। इसमें डोभाल शक्ति का सिद्धांत बताते हैं। वह शुरुआत में ही कहते हैं कि सबको नहीं तो कुछ लोगों को इस विचार से कुछ सोचने और कुछ करने की प्रेरणा मिल सकती है। बाबर रोड लेकिन राणा सांगा रोड नहीं वह कहते हैं, 'इतिहास दुनिया की सबसे बड़ी अदालत है। इससे बड़ी अदालत कोई नहीं है। सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ, हाई कोर्ट में क्या हुआ, लड़ाई के मैदान में क्या हुआ, इलेक्शन में क्या हुआ... ये सब बातें आती हैं और चली जाती हैं। बाद में रह जाता है तो सिर्फ इतिहास। और इतिहास का निर्णय हमेशा उसके पक्ष में गया है जो शक्तिशाली था। इसने कभी उसका साथ नहीं दिया जो न्याय के साथ था, जो सही था। अगर ऐसा होता तो... दिल्ली में बाबर रोड है लेकिन राणा सांगा रोड नहीं है क्योंकि बाबर आया, विजयी हुआ और राणा सांगा हार गए। भारत की हिंदूशाही किंगडम अफगानिस्तान से सिकुड़ते-सिकुड़ते यहां तक नहीं आ जाती। हमने किसी पर आक्रमण नहीं किया, हमने किसी के जीवन मूल्यों को नष्ट नहीं किया। हमने किसी के धर्मग्रंथों और धर्म स्थानों को नष्ट नहीं किया। शायद हम न्यायसंगत थे। शायद सत्य भी हमारे पक्ष में था लेकिन शक्ति हमारे साथ नहीं थी। इसलिए इतिहास ने हमें उसकी सजा दी।'
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