कभी BJP को 'कंगाल' बनाने वाली मायावती आज यूपी में खुद उसी हालत में कैसे?

नई दिल्ली सियासी लिहाज से सबसे बड़े सूबे यूपी का चुनावी माहौल फिलहाल बीजेपी बनाम एसपी के बीच द्विध्रुवीय मुकाबले का दिख रहा है। राष्ट्रीय स्तर पर दलित राजनीति को एक नया मुकाम देने वाली बीएसपी अपने ही गढ़ यूपी में मुकाबले से बाहर दिख रही है। पिछले कुछ सालों में पार्टी के तमाम बड़े नेता दूसरी पार्टियों का दामन थाम चुके हैं। चुनाव दर चुनाव पार्टी के प्रदर्शन में गिरावट दिख रही है। आइए समझने की कोशिश करते हैं कि यूपी में पिछले 3 दशकों में 4 बार यूपी को मुख्यमंत्री देने वाली बीएसपी इस बार के चुनाव में है कहां। कभी यूपी में बीजेपी को 51 सीटों पर सिमेट देने वाली बीएसपी आज खुद सूबे की सियासत में क्यों हाशिए पर दिख रही है? इस बार भी एकला चलो की राह पर मायावती यूपी में इक्का-दुक्का चुनावों को छोड़कर हर बार बीएसपी एकला चलो रे की नीति पर चली है। 90 के दशक में कुख्यात गेस्ट हाउस कांड के बाद समाजवादी पार्टी से गठबंधन टूटने का अनुभव इतना कड़वा रहा कि मायावती ने चुनाव पूर्व गठबंधनों से एक तरह से तौबा कर लिया। बीजेपी के साथ चुनाव बाद गठबंधन कर भले ही मायावती ने सरकार बनाई हो लेकिन कभी चुनाव से पहले गठबंधन नहीं किया। 2019 के लोकसभा चुनाव में मायावती ने समाजवादी पार्टी से बहुचर्चित गठबंधन किया लेकिन प्रदर्शन कुछ खास नहीं रहा और जल्द ही गठबंधन टूट भी गया। 2022 का यूपी विधानसभा चुनाव भी बीएसपी अकेले ही लड़ने जा रही है। खास बात ये है कि इस बार बीएसपी चुनाव घोषणा पत्र भी जारी नहीं करेगी। 1993 में राष्ट्रीय राजनीति में पहली बार सुनाई दी बीएसपी की धमक 1984 में कांशी राम ने बहुजन समाज पार्टी की स्थापना की थी। उन्होंने अपने जीते जी मायावती को सियासी वारिस बनाया। 1993 के विधानसभा चुनाव में बीएसपी की पहली बार राष्ट्रीय स्तर पर धमक दिखी जब वह यूपी विधानसभा चुनाव में 67 सीटों पर जीत हासिल की। यूपी में करीब 21 प्रतिशत दलित वोटर हैं। इसके अलावा 20 प्रतिशत के करीब मुस्लिम मतदाता हैं। बीएसपी की ताकत दलित+मुस्लिम समीकरण रहा। 2 साल बाद ही 1995 में मायावती पहली बार यूपी की मुख्यमंत्री बनीं। पहली दलित महिला जो किसी राज्य की मुख्यमंत्री बनीं। हालांकि, वह 4 महीने तक ही सत्ता में रहीं। 1997 में वह दूसरी बार सीएम बनीं और इस बार भी महज 6 महीने कुर्सी पर रह पाईं। 2002 में मायावती तीसरी बार मुख्यमंत्री बनीं और इस बार वह 15 महीने तक मुख्यमंत्री रहीं। यूपी के विधानसभा चुनाव में बीएसपी का प्रदर्शन
यूपी विधानसभा चुनाव बीएसपी की सीटें वोट शेयर (%)
1993 67 11
1996 67 19.64
2002 98 23
2007 206 30.43
2012 80 26
2017 19 22
2007 में बीएसपी का ऐतिहासिक प्रदर्शन, फिर ढलान 2007 के यूपी विधानसभा चुनाव में बीएसपी का प्रदर्शन ऐतिहासिक रहा। 403 में से 206 सीटों पर जीत हासिल कर पहली बार बीएसपी पूर्व बहुमत के साथ सत्ता में आई। वोट शेयर 30.43 प्रतिशत रहा। इसका श्रेय बीएसपी की सोशल इंजीनियरिंग को दिया जाता है। सतीश चंद्र मिश्र को आगे कर बीएसपी गैरदलित खासकर ब्राह्मणों को साधने में कामयाब रही। दलित+मुस्लिम+ब्राह्मण फॉर्म्युले से बीएसपी ने यूपी में ढाई दशकों से चले आ रहे गठबंधन सरकारों के दौर को खत्म किया। लेकिन उसके बाद से बीएसपी के प्रदर्शन में तेजी से गिरावट का दौर शुरू हुआ। 2012 में बीएसपी सिर्फ 80 सीटें जीत सकी। वोटशेयर घटकर 25.95 प्रतिशत रह गया। 2014 के लोकसभा चुनाव में बीएसपी खाता तक नहीं खोल पाई। 2017 विधानसभा चुनाव में पार्टी 19 सीटों पर सिमट गई और वोट शेयर गिरकर 22.24 प्रतिशत रह गया। बीजेपी और बीएसपी का अजब संयोग मायावती यूपी में 4 बार मुख्यमंत्री रहीं और इनमें से 3 बार बीजेपी के समर्थन से ये मुमकिन हुआ। दिलचस्प बात यह है कि मायावती जिस बीजेपी के समर्थन से सत्ता में रहीं, उसी को सबसे ज्यादा नुकसान भी पहुंचाया। 1999 में केंद्र की अटल बिहारी वाजपेयी सरकार गिराने में बीएसपी की बड़ी भूमिका रही। बीएसपी ने बीजेपी को अपने 5 सांसदों के समर्थन का भरोसा दिया था लेकिन विश्वास मत के दौरान ऐन वक्त पर मायावती ने ऐलान किया कि उनकी पार्टी विरोध में वोट देगी। नतीजा यह हुआ कि वाजपेयी सरकार महज एक वोट से विश्वास मत हार गई। संयोग ही है कि बीएसपी जैसे-जैसे यूपी में मजबूत हुई, बीजेपी कमजोर होती गई। 2007 में जब बीएसपी पहली बार पूर्व बहुमत के साथ यूपी की सत्ता में आई तब बीजेपी 51 सीटों पर सिमट गई। 2012 में वह और कमजोर हुई और महज 47 सीट ही जीत पाई। लेकिन 2017 में जब बीजेपी 312 सीटों के साथ एकतरफा जीत हासिल की तब बीएसपी 19 सीट पर सिमट गई। ऐसा लग रहा है जैसे वक्त का पहिया 180 डिग्री घूम गया हो। कभी यूपी में बीजेपी को 'कंगाल' करने वाली बीएसपी भगवा पार्टी के फिर मजबूत होने के साथ ही सूबे की सियासत में हाशिए पर पहुंच गई है। पिछले लोकसभा चुनावों में बीएसपी का प्रदर्शन
लोकसभा चुनाव बीएसपी को मिलीं सीटें
1996 11
1998 5
1999 14
2004 19
2009 21
2014 00
2019 10
बीएसपी की 'दुर्गति' की वजह बतौर मुख्यमंत्री मायावती का 2007 से 2012 का कार्यकाल नकारात्मक वजहों से चर्चा में रहा। विरोधी उन्हें 'दौलत की बेटी' कहने लगे। जन्मदिन और यहां तक कि चुनावी सभाओं में भी मायावती का स्वागत 'नोटों की माला' पहनाकर होने लगा। एनआरएचएम घोटाले में उनके मंत्रियों और विधायकों का नाम आने लगा। एक के बाद एक सीएमओ की हत्याएं होने लगीं। मायावती ने जो पार्क बनवाएं उनमें दलित महापुरुषों के साथ अपनी भी मूर्तियां लगवाईं। हाथियों की बड़ी-बड़ी मूर्तियां लगवाई गईं। विरोधी उनकी छवि विकास के बजाय हाथियों की मूर्तियों पर पानी की तरह पैसे बहाने वाली नेता की बनाने में कामयाब हो गए। 2012 में समाजवादी पार्टी पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आई। 2014 में मोदी लहर में बीएसपी उड़ गई। लोकसभा चुनाव में खाता तक नहीं खोल पाई। गैर-जाटव दलित वोट खिसककर बीजेपी के पास चला गया। सत्ता से दूर होने के बाद मायावती के भरोसेमंद नेता एक-एक कर बीएसपी छोड़ने लगे। नसीमुद्दीन सिद्दीकी, बाबू सिंह कुशवाहा, स्वामी प्रसाद मौर्य जैसे बीएसपी के कभी दिग्गज कहे जाने वाले नेता या तो दूसरी पार्टियों का दामन थाम लिए या फिर पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में उन्हें निकाल दिया गया। बीएसपी की दुर्गति की एक बड़ी वजह मायावती की कार्यशैली भी रही। अखिलेश यादव, प्रियंका गांधी वाड्रा जैसे दूसरे दलों के नेता सड़कों पर उतर रहे हैं। चुनावी यात्राएं कर रहे हैं। कार्यकर्ताओं में जोश भर रहे हैं। लेकिन मायावती किसी भी मुद्दे पर सड़कों पर नहीं उतरी। इससे कार्यकर्ताओं का मनोबल टूट रहा और संगठन लगातार कमजोर हो रहा है। इस बीच चन्द्रशेखर आजाद जैसे दूसरे दलित नेताओं का उभार हो रहा है। क्या कमबैक कर सकती हैं मायावती? वैसे आंकड़ों को देखें तो 2019 के लोकसभा चुनाव में बीएसपी 19 प्रतिशत वोट शेयर के साथ यूपी में दूसरे नंबर की पार्टी है। 10 लोकसभा सीटें जीतने में कामयाब रही लेकिन उसका श्रेय समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन को जाता है। बीएसपी अपने बुरे दौर में भी करीब 20 प्रतिशत वोटशेयर बरकरार रखने में कामयाब रही है। यानी उसे पूरी तरह नजरअंदाज तो नहीं ही किया जा सकता।


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