सुप्रीम कोर्ट इसरो के साइंटिस्ट को झूठे जासूसी मामले में फंसाने और प्रताड़ना मामले में अभियोजन के लिए सीबीआई को और तथ्य जुटाने होंगे। पूर्व जस्टिस डीके जैन की कमिटी ने आरोपी पुलिस कर्मियों के रोल को लेकर जो जांच की है सिर्फ उस रिपोर्ट के आधार पर सीबीआई मामले में अभियोजन नहीं कर सकती। 2018 में इस मामले की जांच के लिए हाई पावर कमिटी बनाई गई थी जिसने अपनी रिपोर्ट सौंप दी है। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस डीके जैन की अगुवाई वाली कमिटी का गठन सुप्रीम कोर्ट ने किया था। सुप्रीम कोर्ट ने 14 सितंबर 2018 को कमिटी का गठन किया था और केरल सरकार से कहा था कि नारायणन के अपमान के मामले में उन्हें 50 लाख रुपये मुआवजा दिया जाए। नारायण को मामले में बरी किया गया था। रिपोर्ट प्रारंभिक जानकारी, अभी छानबीन बाकीसुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मामले में सीबीआई ने पुलिस कर्मियों के रोल की जांच के लिए एफआईआर दर्ज की है। सिर्फ कमिटी की रिपोर्ट के आधार पर सीबीआई आरोपियों के खिलाफ अभियोजन नहीं चला सकती। सीबीआई को मामले में छानबीन करनी होगी उन्हें तथ्य एकत्र करने होंगे और मामले में छानबीन करनी होगी। अभियोजन का आधार कमिटी की रिपोर्ट नहीं हो सकती है। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस एएम खानविलकर की अगुवाई वाली बेंच के सामने एक आरोपी के वकील ने कहा कि कमिटी की रिपोर्ट की कॉपी उन्हें दी जानी चाहिए क्योंकि सीबीआई उस रिपोर्ट पर भरोसा कर रही है। तब सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि रिपोर्ट प्रारंभिक जानकारी है आखिरकार सीबीआई को इस मामले में छानबीन करनी है। इस दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि सीबीआई ने जो केस दर्ज किया है वह सार है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि रिपोर्ट कहती है कि सीबीआई ने केस दर्ज कर रखा है लेकिन वह वेबसाइट पर नहीं है। तब मेहता ने कहा कि एफआईआर दर्ज किया गया है और उसकी कॉपी संबंधित अदालत में पेश की जा चुकी है। कोर्ट की इजाजत होगी तो समय के साथ उसे अपलोड किया जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आरोपी को जो भी कानूनी उपचार उपलब्ध है वह मिलेगा और संबंधित अदालत कानून के तहत फैसला करेगा। 1994 में गिरफ्तार हुए थे नारायणन1994 का ये मामला है। इसमें आरोप है कि कुछ गोपनीय दस्तावेज अन्य देश के लोगों को सौंपा गया था। इस मामले में साइंटिस्ट नारायणन को गिरफ्तार किया गया था। बाद में सीबीआई ने अपनी जांच रिपोर्ट में कहा था कि नारायणन की अवैध गिरफ्तारी थी और केरल के तत्कालीन आला पुलिस अधिकारी इसके लिए जिम्मेदार हैं। यह मामला तब काफी तूल पकड़ लिया था और तत्कालीन मुख्यमंत्री को इस्तीफा देना पड़ा था। SC ने दिया था मुआवजे का आदेशनारायणन को पीड़ा पहुंचाने और उन्हें प्रताड़ना करने के लिए दोषी ऑफिसरों के खिलाफ जांच और उचित कदम उटाने के लिए हाई पावर कमिटी का गठन का आदेश दिया था। सुप्रीम कोर्ट में सॉलिसिटर जनरल ने बताया था कि रिपोर्ट दाखिल कर दी गई है और ये मामला राष्ट्रीय महत्व का मुद्दा है। सुप्रीम कोर्ट ने इसरो के पूर्व साइंटिस्ट के खिलाफ पुलिस कार्रवाई पर 2018 में कहा था कि उन्हें कस्टडी में लेकर उनके ह्यूमैन राइट्स का उल्लंघन किया गया है और उनकी उपलब्धियों को कलंकित करने की कोशिश हुई है। 14 सितंबर 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने 1994 में झूठे जासूसी मामले में फंसाए गए इसरो के पूर्व वैज्ञानिक नांबी नारायण को बड़ी राहत दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने केरल सरकार को निर्देश दिया था कि वह मानसिक प्रताड़ना के मामले में इसरो के पूर्व साइंटिस्ट को 50 लाख रुपये मुआवजे का भुगतान करे। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि इस बात में कोई संदेह नहीं है कि इस कारण एक राष्ट्रीय पहचान वाले साइंटिस्ट को अपमान का सामना करना पड़ा है। उन्हें बिना किसी कारण के बदनाम किया गया है। उन्हें फर्जी केस में फंसाया गया और पुलिस ने उन्हें हिरासत में रखा। सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अगुवाई वाली बेंच ने मामले में कमिटी का गठन किया था। जिन पुलिस अधिकारियों के कारण नांबी को मानसिक प्रताड़ना से गुजरना पड़ा है उनके खिलाफ कार्रवाई के बारे में कमिटी को सुझाव पेश करने को कहा गया था।
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