इंदौर. खाकी वर्दी धारी एक को प्रकृति से इतना प्रेम है कि वे हर अवसर को जिंदगी का यादगार पल बनाने के लिए पौधा रोपण करते है। पुलिस की नौकरी में वह जिस भी शहर में गए, वहां के दफ्तर, घर, आसपास के क्षेत्र को उन्होंने हरियाली की चादर ओढ़ा दी। वे खुद को पौधे लगाते ही है। अपने साथियों को भी इसके लिए प्रेरित करते है। पहले बेटे के जन्मदिन पर पौधा लगाकर अभियान शुरू किया। इसके बाद से जो जैसे सिलसिला ही शुरू हो गया। परिवार या स्टॉफ में किसी का जन्मदिन हो, किसी महापुरुष की जंयती या पुण्यतिथि हो, वे पौधे लगाना नहीं भूलते है। सिर्फ पौधे लगाते ही , बल्की उनका पूरा ध्यान भी रखते है। सच कहे तो खाकी वर्दी के पीछे एक दिल है जो कि इस धरा को हरियाली की चादर ओढ़ाने के लिए धड़कता और मचलता है।
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हम बात कर रहे हैं एसपी (पश्चिम) महेशचंद्र जैन की। वो हर अवसर को पौधे लगाकर यादगार बना देते हैं। जहां पर भी उनकी पोस्टिंग हुई, उस बंगले के साथ ही आसपास के इलाके को भी हरा-भरा कर दिया। पुलिस ट्रेनिंग कॉलेज (पीटीसी) में ही चार हजार पौधे उनके कार्यकाल में लगाए गए। हर विशेष मौके पर पौधों की संख्या भी उसी अनुसार होती है। आज पर्यावरण दिवस पर भी वे 21 पौधे अपने घर पर लगा रहे हैं। एक स्कूल के बाहर धूप में खड़े होकर परिजन को बच्चों का इंतजार करते देखा तो वहां पौधे लगा दिए। प्रतिदिन उनकी देखभाल भी करते रहे, जब तक कि वे बढऩे व खुद पोषित न होने लगें।
1999 से एक अभियान का रूप
जैन ने बताया कि उनकी पहली पोस्टिंग लटेरी में हुई, वहां पर पहला पौधा उन्होंने लगाया। वह अपनी गाड़ी में ही पौधारोपण का सारा सामान साथ रखते और जब भी मौका मिलता, पौधा लगा देते। इसके बाद मंडलेश्वर, इटारसी पुलिस लाइन में भी खूब पौधे लगाए। नीमच में पोस्टिंग के दौरान 6 जनवरी 1999 को बेटे के जन्म पर पौधा रोपा और उस दिन से ही इसे एक अभियान का रूप दे दिया। इसके लिए स्लोगन दिया- जन्मदिन को यादगार बनाएं, पौधे लगाएं, स्मृति को अमर बनाएं। इसके बाद से ही वे लगातार अपने या परिवार के किसी भी सदस्य के जम्मदिन या फिर शादी की सालगिरह या दूसरे यादगार मौकों पर एक पौधा जरूर लगाते हैं। इसके साथ ही देश की महान विभूतियों की जयंती और पुण्यतिथि पर भी एक पौधा लगाते हैं। इसके बाद उसके बड़े होने तक की जिम्मेदारी भी निभाते हैं।
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झाबुआ में पूरी पहाड़ी हरी कर दी
झाबुआ पोस्टिंग के दौरान उनके मन में वहां की एक अलग छवि थी। पूरा इलाका पेड़ों से भरा हुआ होगा, यह सोचा था, लेकिन रास्ते में उन्हें कोई पेड़ नहीं दिखे। इस पर वहां पौध़े लगाने की सोची। वहां पर जगह-जगह पौधे तो लगाए ही, इसके साथ ही हाथीपावा पहाड़ी को चुना। इंदौर के पितृ पर्वत की तर्ज पर वहां भी पौधे लगाने की सोची। इसके लिए पहले गड्ढे खुदवाकर वहां मिट्टी भरवाई गई, फिर पौधे लगाए। उन्होंने तो पौधे लगाए ही, पुलिस परिवार और स्कूली बच्चो को भी साथ लिया। वहां पानी की भी व्यवस्था की गई, ताकि पौधे सूखे नहीं। गर्मी में लगातार उन्हें सींचते भी रहे, ताकि वे आसानी से मौसम की मार झेल सकें। आज भी उस पहाड़ी पर 90 प्रतिशत पौधे जिंदा हैं और अब पेड़़ बन चुके हैं। पहाड़ी के अलावा भी वहां पर सैकड़ों पौधे वे लगा चुके हैं।
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