ब्लॉगः बहुत सारे किंतु-परंतु हैं, लेकिन इसलिए चाहिए 'एक देश, एक चुनाव'

अगर आप पूरे चुनावी अभियान पर नजर डालें, तो पाएंगे कि पूरे अभियान में तंज के सिवाय कहीं कुछ और है ही नहीं। होने को तो बहुत कुछ अलग हो सकता था। बहस इस बात पर भी हो सकती थी कि अगली सरकार चाहे जिस पार्टी की बने, लेकिन कोरोना से पार पाने का रास्ता क्या होगा और इस बात पर भी कि वह चूक कहां हुई, जिस वजह से कोरोना की दूसरी लहर की गंभीरता को ठीक से पढ़ा नहीं जा सका। यही नहीं, बहस इस बात पर भी हो सकती थी कि इंसानी जीवन की कीमत क्या सियासत के बाजार में इतनी भी नहीं, जहां उसके लिए बात करने का वक्त निकाला जा सके?

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