Kisan Tractor Rally: दिल्ली में जो हुआ, उसके संकेत 25 जनवरी की रात से ही मिलने लगे थे

नई दिल्ली दिल्ली में इस 26 जनवरी को जो हुआ वह पहले कभी नहीं हुआ था। इस सारे मामले से पुलिस की चुनौतियों और किसान आंदोलन के नेतृत्व की कमजोरियों की बात भी सामने आई हैं। सबसे बड़ा सवाल था कि क्या किसान नेतृत्व उस रास्ते और नियम-कायदों को मानेगा जिसका वादा उसने पुलिस के साथ किया है। 25 जनवरी की रात से ही संकेत मिलने लगे थे कि सब ठीक नहीं है। हमारे रिपोर्टर राजेश पोद्दार ने रात 9 बजे अपडेट दिया था कि किसान मजदूर संगठन के लोग इस रजामंदी के खिलाफ हैं और संयुक्त मोर्चा से अलग जा रहे हैं। यानी साफ हो गया था कि जिन नेताओं से बात हो रही है उनसे हालात नहीं संभल रहे। आंदोलनकारी किसान नेताओं की जिम्मेदारी इससे कम नहीं हो जाती। अब वे भले ही इसके लिए आसामाजिक तत्वों को जिम्मेदार ठहरा रहे हों, लेकिन क्या उन्हें पहले यह आशंका नहीं थी कि जितनी तादाद में वहां लोग एकत्र हैं, उन पर उनका कंट्रोल कर पाना आसान नहीं है। बड़े किसान नेताओं ने क्यों नहीं वक्त से पहले परेड निकालने से रोका। पढ़ें: कोई किसान नेता रोकने के लिए आगे नहीं आया अगर उस वक्त कुछ लोग उनकी बात को नहीं मानते तो वे उसी वक्त पुलिस से उन्हें रोकने के लिए मदद ले सकते थे। यही नहीं, जब आंदोलनकारी तीनों जगह बॉर्डरों से निकलकर सड़कों पर आगे बढ़ रहे थे, तब भी कोई बड़ा किसान नेता उन्हें रोकता नजर नहीं आया, जिसका नतीजा यह हुआ कि गणतंत्र दिवस पर ही दिल्ली में इतना बड़ा बवाल हो गया। क्या पुलिस के पास नहीं था प्लान बी? इस सारे मामले में दिल्ली पुलिस पर भी सवाल उठे हैं कि क्या इंटेलिजेंस नेटवर्क को इसका अंदाजा नहीं था। हालांकि यह भी स्वीकार करना होगा कि लाखों की भीड़ और इतनी बड़ी तादाद में ट्रैक्टरों का आना, वह भी 26 जनवरी को परेड के दिन और परेड के वक्त, पुलिस के लिए यह एकदम नई और अभूतपूर्व चुनौती थी। इसके बावजूद पुलिस ने बेहद संयम बरता और हालात और ज्यादा बिगड़ने से रोका। हिंसा हुई लेकिन ऐसी भी नहीं हुई कि हालात संभल न सके। हालांकि हुड़दंगियों के आईटीओ और लालकिला तक पहुंच जाने से यह भी सवाल उठता है कि आखिरकार पुलिस ने कोई प्लान बी क्यों नहीं तैयार किया और अगर तैयार किया तो फिर उस पर अमल क्यों नहीं हुआ। पुलिस ने सिर्फ किसान नेताओं पर कैसे कर लिया यकीन? सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि पुलिस ने सिर्फ आंदोलनकारी किसान नेताओं के वादों पर ही कैसे भरोसा कर लिया? हालांकि पुलिस की इस मामले में जरूर सराहना होनी चाहिए कि उसने बेहद संयम से कार्य किया और अगर कहीं भी पुलिसकर्मियों का संयम टूटता तो उसका दूरगामी और बुरा असर होता। पुलिस के संयम करतने का ही नतीजा है कि 12 घंटे से कम वक्त में हुड़दंगियों पर न सिर्फ काबू पाया गया बल्कि उन्हें दिल्ली की मुख्य सड़कों से हटा भी दिया गया। पूर्व पुलिस कमिश्नर अजयराज शर्मा का भी कहना है कि पुलिस की बड़ी प्लानिंग बेहतर होती तो आंदोलनकारियों को तय वक्त से पहले परेड निकालने की इजाजत ही नहीं देते और वहां इतनी पुलिस फोर्स होनी चाहिए थी कि वे वहां से आगे बढ़ ही नहीं पाते।


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