स्त्री हमेशा से उपेक्षित, प्रताड़ित और दलित हैः मैत्रेयी पुष्पा

सुप्रसिद्ध कथाकार और दिल्ली की हिंदी साहित्य अकादमी की पूर्व उपाध्यक्ष मैत्रेयी पुष्पा अपनी बेबाकी और साहसपूर्ण लेखन के लिए जानी जाती हैं। अपनी रचनाओं में हमेशा गांव की साधनहीन स्त्रियों की समस्याओं को उठाने वाली मैत्रेयी पुष्पा से बातचीत की संध्या रानी ने। प्रस्तुत हैं मुख्य अंश : विवाद और विरोध आपके लेखन के साथ शुरू से जुड़े रहे हैं। क्या कहेंगी? देखिए, जो सत्य है उसे कहने में संकोच कैसा? मुझे जो सही लगा, मैंने लिखा। जो मैं देख रही हूं, अनुभव कर रही हूं, और जो विधा मुझे रास आई, उसके जरिए मैंने अपनी कहानी, उपन्यास में बात कही है। इससे दूसरे को क्या मतलब? एक लेखक की ईमानदारी कलम और खुद के साथ होती है। लिखने के लिए आपने ग्रामीण परिवेश को ही क्यों चुना? अनुभव से ही विचार निकलते हैं। मेरे जीवन के बीस साल गांव में ही बीते हैं। मैं वहीं पढ़ी हूं। मां ग्राम सेविका थीं। वे प्रोग्रेसिव विचारधारा की थीं और बहुत ही अनुशासनप्रिय भी थीं। कई बार मैं उनका अनुशासन नहीं मानती थी, तो वे कुछ बोलती तो नहीं थीं, पर जाहिर जरूर कर देती थीं कि उनको यह पसंद नहीं है। गांव में देखती थी कि कैसे लोग जमीन के लिए एक-दूसरे से झगड़ते हैं और मुकदमा भी कर देते हैं। उसी परिवेश में मेरी सोच विकसित हो रही थी। सपने सजाने के लिए मुझे कभी मौका नहीं मिला। लेखन में आई, तो मेरे दिमाग में वही सब आया। क्या यह सच है कि जब आप दूसरे की कहानी पढ़ती हैं तो आपको प्रेरणा मिलने लगती है? हां, पहले ऐसा खूब होता था। जब भी मैं कोई कहानी या उपन्यास पढ़ती थी, तो उसी के अनुसार या विपरीत कहानी चलने लगती थी। लेकिन लेखक को अपनी तरह लिखना चाहिए। यही उसकी पहचान है। अपने समकालीन और वरिष्ठ साहित्यकारों में आप किसे पढ़ना सबसे अधिक पसंद करती हैं? मैं सभी को पढ़ लेती हूं, लेकिन अधिकतर रचनाएं मेरे माहौल से कम मेल खाती हैं। पढ़ कर मेरे अंदर बदलाव आए, ऐसा नहीं होता। शहर की लेखिकाएं बहुत बौद्धिक हैं। मैं अपने पाठकों के लिए पढ़ती-लिखती हूं। हर वह कहानी समकालीन है, जो आपको आपके माहौल से जोड़ देती है। प्रेमचंद, रेणु, रांगेय राघव और जयशंकर प्रसाद आदि को पढ़ना बहुत अच्छा लगता है। स्त्री हमेशा से उपेक्षित, प्रताड़ित और दलित है तो मेरा ध्यान उधर ही जाता है कि पहले के लेखकों ने स्त्री को कैसे देखा-परखा है। इतने अनुभवों के बाद अब आप हिंदी साहित्य को कैसे देखती हैं? हमारी लेखिकाओं के पास सीमित अनुभव है। वे विस्तार वाले अनुभवों में नहीं जाना चाहती हैं। नगरों और महानगरों में सारे साधन हैं, वे उससे ले लेती हैं। यह इंटरनेट का विषय नहीं है, बल्कि जीवन का विषय है। जब तक उस दुख-दर्द को महसूस नहीं करेंगे, तब तक लेखन में कोई फीलिंग नहीं ला सकते हैं। लेखक के लिए यात्राएं बहुत जरूरी होती हैं। अल्मा कबूतरी लिखते समय मैं उन्हीं के डेरे में सालों रही थी। रात को अपने गांव आ जाती थी। आज के लेखक सुविधाओं के गुलाम हैं। आज के स्त्री विमर्श को आप किस तरह देखती हैं? मैं इसे स्त्री विमर्श नहीं मानती, मनमानी मानती हूं। लेखिकाएं आपस में लड़ रही हैं, तो कभी एक-दूसरे का कपड़ा फाड़ती हैं। कभी इतनी दोस्ती, तो कभी दुश्मन हो जाती हैं। सबके दल बन गए हैं, जबकि मैं किसी दल में नहीं हूं। सोशल मीडिया का जमाना है। पुस्तक का प्रचार होता है, पर पाठक नदारद हैं, जबकि लेखक के लिए सबसे ज्यादा जरूरी अनुशासन होता है। आपके और राजेंद्र यादव के संबंधों को लेकर आज भी कई बातें में सुनने में आती है। इसके बारे में क्या कहेंगी? वे मुझे भी किसी पात्र से जोड़ देते थे। यहां तक कि मेरे और राजेंद्रजी के बारे में पर्चे भी छापे गए थे। इससे मैं बहुत दुखी हुई थी। तब उन्होंने कहा था कि मेरा और तुम्हारा संबंध कृष्ण और द्रौपदी का है। मेरे पति उनका बहुत सम्मान करते थे। उनके खाने की मनपसंद चीजें बनवाते थे।


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