नई दिल्ली मौसम में परिवर्तन होने के साथ ही वायुमंडल में प्रदूषण का लेवल बढ़ता जा रहा है। हर साल इन्हीं महीनों के दौरान सांस लेना दूभर हो जाता है। राजधानी दिल्ली और एनसीआर में तो हालात बद से बदतर हो जाते हैं लेकिन इसी बीच एक अच्छी खबर ये है कि भारत के सल्फर डाइऑक्साइड (So2) उत्सर्जन में 2018 के मुकाबले 2019 में करीब छह फीसदी की कमी आई है। बीते चार साल में एसओटू (So2) उत्सर्जन में आई यह सबसे बड़ी कमी है। खपत में 10 फीसदी कमीएक रिपोर्ट में यह कहा गया है कि सल्फर डाइऑक्साइड उत्सर्जन में कमी के बावजूद भारत लगातार पांचवे साल सबसे ज्यादा सल्फर डाइऑक्साइड उत्सर्जन करने वाला देश बना हुआ है। ‘ग्रीनपीस इंडिया’ और ‘सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एजर्नी ऐंड क्लीन एयर’ (CREA) के विश्लेषण पर आधारित रिपोर्ट मंगलवार को जारी हुई। एसओ 2 उत्सर्जन सभी शीर्ष तीन बड़े उत्सर्जकों में भारत,रूस और चीन है। गिरावट का सिलसिला अभी भी जारी है यहां तक कि 2020 में भी जनवरी-अगस्त की अवधि में कोयले की खपत में 10% की गिरावट आई है। बेहद खतरनाक है SO2गुरुवार को इन निष्कर्षों को जारी करते हुए सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (CREA) और ग्रीनपीस इंडिया ने अक्षय ऊर्जा की दिशा में देश के SO2 उत्सर्जन में गिरावट का कारण कोयले की कम खपत बताया है। सल्फर डाइऑक्साइड विषैला वायु प्रदूषक होता है जो मस्तिष्काघात, ह्रदयरोग, फेफड़ों का कैंसर और असमय मौत की जोखिम बढ़ाता है। भारत में कहां से फैलता है SO2रिपोर्ट में कहा गया, ‘भारत में 2019 हुआ मानवजनित एसओटू उत्सर्जन वैश्विक उत्सर्जन का 21 फीसदी था और यह दूसरे सबसे ज्यादा उत्सर्जन करने वाले देश रूस के मुकाबले दोगुना है।’ इसमें कहा गया कि चीन सर्वाधिक उत्सर्जन करने वाला तीसरा देश है। रिपोर्ट के मुताबिक भारत मे एसओटू का सर्वाधिक उत्सर्जन सिंगरौली, नेवेली, सीपत, मुंद्रा, कोरबा, बोंडा, तमनार, तालचेर, झारसुगुडा, कच्छ, सूरत, चेन्नई, रामगुंडम, चंद्रपुर, विशाखापत्तन और कोराडी स्थित थर्मल पॉवर संयंत्रों से होता है। वायु गुणवत्ता अब भी सुरक्षित नहीं है- अविनाश चंचलरिपोर्ट में नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में उन्नति करने के लिए भारत की प्रशंसा भी की गई। ग्रीनपीस इंडिया के ‘क्लाइमेट कैंपेनर’ अविनाश चंचल ने कहा कि नवीकरणीय ऊर्जा की क्षमता भले बढ़ी हो लेकिन वायु गुणवत्ता अब भी सुरक्षित नहीं है। उन्होंने कहा, ‘भारत में, देखा जा सकता है कि कोयले के इस्तेमाल में कमी लाकर वायु गुणवत्ता तथा सेहत को किसी प्रकार प्रभावित किया जा सकता है। 2019 में नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता बढ़ाई गई, कोयले पर निर्भरता घटाई गई जिसके परिणामस्वरूप हमने वायु गुणवत्ता में सुधार देखा। लेकिन हमारी वायु अब भी सुरक्षित नहीं है।’
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