नेताओं की सभाओं में स्वत: स्फूर्त भीड़ पहले भी नहीं जुटती थी, उन्हें जुटाया जाता था। जुटाने के भी कई तरीके हुआ करते थे। कहीं इलाके के मुखिया के प्रभाव में उन्हें गाड़ियों में भर कर लाया जाता था, कहीं उन्हें किसी सरकारी योजना का लाभ दिलाने का लालच देकर इकट्ठा कर लिया जाता था और कई दफे बगैर किसी लाग-लपेट के यह कहकर कि तुम्हें एक दिन की जितनी मजूदरी मिलती होगी,उससे बढ़ाकर हमसे लेना, दोपहर का खाना अलग से, लेकिन रैली में चलना है। कोई गड़बड़ नहीं होनी चाहिए।
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